मन की शांति के लिए लोग न जाने कितने तरह के उपाय करते रहते हैं पर सब व्यर्थ जाता है। हम मन की शांति के लिए मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा चर्च सबका चक्कर लगाते हैं लेकिन बस कुछ देर के लिए ही शांति मिलती है और फिर हम असली रूप में आ जाते हैं। फिर कभी कभी हम शांति की तलाश में कहीं टूर पे निकल जाते हैं ये सोचके की चलो कुछ दिन के लिए बाहर घूमके आयेंगे तो थोड़ा मन हल्का हो जायेगा। पर ये सारे उपाय भी बस कुछ पल या कुछ दिन के लिए ही आपको अच्छा फील कराएगा। ये कोई परमानेंट सोल्यूशन नहीं है।
एक आखिरी उपाय जो आजकल लोग ज्यादा आजमाते हैं शांत होने के लिए। वो है ध्यान या मैडिटेशन। ये तरीका तो इतना फल फुल रहा है की पुरे वर्ल्ड में न जाने कितने ही सेंटर्स खुल गए हैं।
बेसक ध्यान ही एक ऐसा तरीका है जिसके माध्यम से आप मन को परमानेंटली शांत कर सकते हैं। पर ध्यान को सबने हव्वा बना दिया है। सबको लगता है की ध्यान सिखने के लिए हमें ध्यान केंद्र जाना पड़ेगा। ध्यान तो बहुत मुस्किल काम है मुझसे तो होता ही नहीं।
असल में ध्यान करना उतना भी मुस्किल नहीं है की इसके लिए आपको ध्यान सिखने के लिए कहीं जाना पड़े। ध्यान आप कहीं भी कभी भी कर सकते हैं। ध्यान कैसे करें इसके लिए बहुत ही सरल उपाय मैं आपको अगले आर्टिकल में बताऊंगा। अभी आपको बिना ध्यान किये ही मन को कैसे शांत करें इसके बारे में बताता हूँ।
मन को शांत करने के लिए पहले मन को समझे की ये क्या है और ये कैसे काम करता है।
मन को वैसे तो अंग्रेजी में माइंड कहते हैं लेकिन असल में मन माइंड नहीं है। माइंड तो दिमाग है और दिमाग मन नहीं है। ये दोनों अलग अलग है। मन एक अद्रिस्य शक्ति है इसे बस आप फील कर सकते है प्रूव नहीं कर सकते। येही कारण है की विज्ञान ने मन को माइंड का नाम दिया है। चूँकि साइंस कभी भी मन को शाबित नहीं कर सकती क्युकी ये स्पेस और टाइम से बाहर की चीज है। मन को सिद्ध करने के लिए लॉजिकल नहीं बल्कि आध्यात्मिक होना जरूरी है।
चलिए अब मै सीधा ये बताने जा रहा हूँ की आप बिना कुछ किये मन को शांत कैसे कर सकते हैं।
असल में मन को शांत बिना कुछ किये ही किया जा सकता है। बिना कुछ किये बिना कुछ सोचे ही केवल मन को शांत किया जा सकता है और कुछ न करना ही सबसे मुस्किल काम है। क्युकी हम हमेशा कुछ न कुछ करते ही हैं। या तो हम काम करते है या नहीं करते हैं। काम करते हैं तो काम के बारे में सोचते हैं और नहीं करते हैं तब क्या करें या क्या किया इसके बारे में सोचते हैं।
असल में जहाँ कर्म है वहां शांति हो ही नहीं सकता क्यूंकि जहाँ कर्ता आ जाता है वहां भाव का आना स्वाभाविक है। आपके अन्दर या तो कर्म का फल पाने का भाव जागेगा या फिर चिंता दुःख या फिर खुशी के भाव जागेंगे। दोनों ही स्थिति में आपका मन भावों से घिरा रहेगा और ऐसे में आपका मन शांत नहीं रह सकता।
तो आप पूछेंगेे की तो क्या कर्म करना छोड़ दें ? नहीं कर्म को छोड़ा भी नहीं जा सकता लेकिन आप कर्म करने के तरीके को बदल सकते हैं। आपको बस ये करना है की आप कर्म को कर्ता भाव से नहीं बल्कि दृष्टा भाव से करें। इसका मतलब ये है की आप सिर्फ करें। इसको ऐसे समझे की मैं कर रहा हूँ या कर रही हूँ की जगह आपको सिर्फ कर रहा हूँ या रही हूँ लगाना है। इससे ये होगा की इसमें मैं शब्द गौण हो जायेगा और आप सिर्फ और सिर्फ कर्ता बन जायेंगे। क्यूंकि सारे भावों का जड़ मैं से शुरू होता है और यही भाव आगे चलकर बड़ा रूप ले लेता है और आप तरह तरह की तनावों से घिर जाते हैं।
आप सोचेंगे की दृष्टा भाव से कर्म करना आसान काम नहीं है असल में जो भी चीज प्राकृतिक है वो आसान ही होता है क्यूंकि प्रकृति कभी भी मुस्किल चीजों को बनाता ही नहीं। हम ही है जो इसे मुस्किल समझते हैं या बना लेते हैं।
आप कभी छोटे बच्चे को गौर से देखना और समझने का प्रयास करना की क्या वे जो भी करते हैं ये सोचके करते हैं ये मैं कर रहा हूँ या रही हूँ या फिर वो सिर्फ करते हैं। उसके सामने खिलौने रखोगे तो वो सिर्फ खेलेगा न की वो ये सोचके खेलेगा की मैं ये खेल रही हूँ या रहा हूँ। इसलिए उनका सारा फोकस खेलने पे होता है। काम्पिटीसन करना तो हम उन्हें सिखाते हैं। और इसी कारण धीरे धीरे जैसे जैसे वो बड़ा होता जाता है उनका फोकस कम होता जाता है।
आप शांत दो तरीके से रह सकते है। एक तो किसी एक चीज पे फोकस करके जैसे की म्यूजिक सुनके या फिर चाँद को टकटकी लगाकर देखने से या फिर फूलों को देखने से। और दूसरा तरीका किसी खाली जगह को देखने से जैसे की आकाश। आपने कभी खाली आकाश को देखा है छत पे सोते हुए ? देखना मन कितना शांत हो जाता है उस वक़्त। क्यूँ ? क्यूंकि खाली जगह के बारे में मन कुछ इमेजिन नहीं कर पाता है इसलिए वो कुछ देर के लिए शांत हो जाता है।
आप कभी नींद आने से पहले के क्षण को देखना जब आप नींद में जा रहे होते हो। आपका मन उस वक़्त बिलकुल शांत अवस्था में होता है। क्यूँ ? क्यूंकि उस वक़्त आप कुछ सोच या कर नहीं रहे होते जो कुछ होता है अपने आप होता है। आप बस ददृष्टा भाव से नींद को देख रहे होते हो की नींद आ रही है। ठीक उसी प्रकार सुबह उठने के बाद कुछ क्षण तक आपका मन बिलकुल शांत रहता है। क्यूंकि उस एक क्षण सिर्फ आप होते हो आपके साथ आपका मैं नहीं होता। और ज्युहीं आपका मैं आपसे जुड़ जाता है आपका मन फिर से बड़बड़ाने लगता है।
जब मैं के न होने में इतनी शांति होती है फिर ऐसे में इस मैं का क्या काम जो मन को हमेशा अशांत करता हो। जिस दिन आप इस तरह से सोचने लगेंगे उस दिन से आपका जीने का ढंग ही बदल जायेगा। उस दिन से आप हमेशा शांत रहने लगेंगे। आप वैसे भी वही करते हो जो आपको अच्छा फील कराता है। जिस दिन आपको सचमुच ये एहसास हो जायेगा की ये मैं शब्द से आपको नुकसान हो रहा है आप खुद ही इससे दूर हो जाओगे क्यूंकि इंसान का ये फितरत होता है की वो हर उस चीज को अपने से दूर करना चाहता है जो उसे दुखी करता है।
गोविंदा का एक एड आता था बनियान का। जिसमे वे बस में होते हैं और किसी व्यक्ति पे उनका धक्का लग जाता है तो वो व्यक्ति गोविंदा से कहते है की धक्का क्यों दिया ? फिर गोविंदा कहते है की तुझको लेने का मन नहीं था तो तूने लिया क्यूँ । ये बात भले ही एड में मजाक के रूप में दिखाया गया हो लेकिन ऐसा हम असल ज़िन्दगी में भी कर सकते है। हम बेवजह चिंता दुःख या क्रोध को अपने ऊपर लेते हैं और परेशान होते हैं। सच तो ये है की ये पूरी तरह से आपपर निर्भर करता है की आप मन के भावों को आपके ऊपर हावी होने देते है या फिर आप ही इन भावों पर हावी होते हैं।
क्यूंकि मन की शक्ति एक ऐसी शक्ति है की जबतक आप इनको वश में रखते हैं तबतक तो सबकुछ सही रहता है लेकिन एक बार ये आपके हाथ से निकल गया फिर आप चाहकर भी इन्हें रोक नहीं सकते क्यूंकि तब इनकी शक्ति आपके विवेक से ज्यादा शक्तिशाली हो जाता है। फिर इन्हें रोकना मुस्किल ही नहीं नामुमकिन हो जाता है। इसीलिए आपने देखा होगा की कई लोग हद पार कर जाते है चाहे प्यार में हो या क्रूरता में। क्यूंकि मन उनके विवेक पे हावी हो जाता है।
मन को बच्चे की तरह पालें उन्हें रोकना भी खतरनाक हो सकता है इसलिए उसे भूलके भी दबाने प्रयास न करें नहीं तो वो अपनी जिद पे अड़ जायेगा। इसलिए मन को अपनी ही स्तिथि में रहने दें। उनको छेड़े नहीं नहीं तो वो तूफ़ान बनकर आप ही को उडा ले जायेगा।
एक आखिरी उपाय जो आजकल लोग ज्यादा आजमाते हैं शांत होने के लिए। वो है ध्यान या मैडिटेशन। ये तरीका तो इतना फल फुल रहा है की पुरे वर्ल्ड में न जाने कितने ही सेंटर्स खुल गए हैं।
बेसक ध्यान ही एक ऐसा तरीका है जिसके माध्यम से आप मन को परमानेंटली शांत कर सकते हैं। पर ध्यान को सबने हव्वा बना दिया है। सबको लगता है की ध्यान सिखने के लिए हमें ध्यान केंद्र जाना पड़ेगा। ध्यान तो बहुत मुस्किल काम है मुझसे तो होता ही नहीं।
असल में ध्यान करना उतना भी मुस्किल नहीं है की इसके लिए आपको ध्यान सिखने के लिए कहीं जाना पड़े। ध्यान आप कहीं भी कभी भी कर सकते हैं। ध्यान कैसे करें इसके लिए बहुत ही सरल उपाय मैं आपको अगले आर्टिकल में बताऊंगा। अभी आपको बिना ध्यान किये ही मन को कैसे शांत करें इसके बारे में बताता हूँ।
मन को शांत करने के लिए पहले मन को समझे की ये क्या है और ये कैसे काम करता है।
मन को वैसे तो अंग्रेजी में माइंड कहते हैं लेकिन असल में मन माइंड नहीं है। माइंड तो दिमाग है और दिमाग मन नहीं है। ये दोनों अलग अलग है। मन एक अद्रिस्य शक्ति है इसे बस आप फील कर सकते है प्रूव नहीं कर सकते। येही कारण है की विज्ञान ने मन को माइंड का नाम दिया है। चूँकि साइंस कभी भी मन को शाबित नहीं कर सकती क्युकी ये स्पेस और टाइम से बाहर की चीज है। मन को सिद्ध करने के लिए लॉजिकल नहीं बल्कि आध्यात्मिक होना जरूरी है।
चलिए अब मै सीधा ये बताने जा रहा हूँ की आप बिना कुछ किये मन को शांत कैसे कर सकते हैं।
असल में मन को शांत बिना कुछ किये ही किया जा सकता है। बिना कुछ किये बिना कुछ सोचे ही केवल मन को शांत किया जा सकता है और कुछ न करना ही सबसे मुस्किल काम है। क्युकी हम हमेशा कुछ न कुछ करते ही हैं। या तो हम काम करते है या नहीं करते हैं। काम करते हैं तो काम के बारे में सोचते हैं और नहीं करते हैं तब क्या करें या क्या किया इसके बारे में सोचते हैं।
असल में जहाँ कर्म है वहां शांति हो ही नहीं सकता क्यूंकि जहाँ कर्ता आ जाता है वहां भाव का आना स्वाभाविक है। आपके अन्दर या तो कर्म का फल पाने का भाव जागेगा या फिर चिंता दुःख या फिर खुशी के भाव जागेंगे। दोनों ही स्थिति में आपका मन भावों से घिरा रहेगा और ऐसे में आपका मन शांत नहीं रह सकता।
तो आप पूछेंगेे की तो क्या कर्म करना छोड़ दें ? नहीं कर्म को छोड़ा भी नहीं जा सकता लेकिन आप कर्म करने के तरीके को बदल सकते हैं। आपको बस ये करना है की आप कर्म को कर्ता भाव से नहीं बल्कि दृष्टा भाव से करें। इसका मतलब ये है की आप सिर्फ करें। इसको ऐसे समझे की मैं कर रहा हूँ या कर रही हूँ की जगह आपको सिर्फ कर रहा हूँ या रही हूँ लगाना है। इससे ये होगा की इसमें मैं शब्द गौण हो जायेगा और आप सिर्फ और सिर्फ कर्ता बन जायेंगे। क्यूंकि सारे भावों का जड़ मैं से शुरू होता है और यही भाव आगे चलकर बड़ा रूप ले लेता है और आप तरह तरह की तनावों से घिर जाते हैं।
आप सोचेंगे की दृष्टा भाव से कर्म करना आसान काम नहीं है असल में जो भी चीज प्राकृतिक है वो आसान ही होता है क्यूंकि प्रकृति कभी भी मुस्किल चीजों को बनाता ही नहीं। हम ही है जो इसे मुस्किल समझते हैं या बना लेते हैं।
आप कभी छोटे बच्चे को गौर से देखना और समझने का प्रयास करना की क्या वे जो भी करते हैं ये सोचके करते हैं ये मैं कर रहा हूँ या रही हूँ या फिर वो सिर्फ करते हैं। उसके सामने खिलौने रखोगे तो वो सिर्फ खेलेगा न की वो ये सोचके खेलेगा की मैं ये खेल रही हूँ या रहा हूँ। इसलिए उनका सारा फोकस खेलने पे होता है। काम्पिटीसन करना तो हम उन्हें सिखाते हैं। और इसी कारण धीरे धीरे जैसे जैसे वो बड़ा होता जाता है उनका फोकस कम होता जाता है।
आप शांत दो तरीके से रह सकते है। एक तो किसी एक चीज पे फोकस करके जैसे की म्यूजिक सुनके या फिर चाँद को टकटकी लगाकर देखने से या फिर फूलों को देखने से। और दूसरा तरीका किसी खाली जगह को देखने से जैसे की आकाश। आपने कभी खाली आकाश को देखा है छत पे सोते हुए ? देखना मन कितना शांत हो जाता है उस वक़्त। क्यूँ ? क्यूंकि खाली जगह के बारे में मन कुछ इमेजिन नहीं कर पाता है इसलिए वो कुछ देर के लिए शांत हो जाता है।
आप कभी नींद आने से पहले के क्षण को देखना जब आप नींद में जा रहे होते हो। आपका मन उस वक़्त बिलकुल शांत अवस्था में होता है। क्यूँ ? क्यूंकि उस वक़्त आप कुछ सोच या कर नहीं रहे होते जो कुछ होता है अपने आप होता है। आप बस ददृष्टा भाव से नींद को देख रहे होते हो की नींद आ रही है। ठीक उसी प्रकार सुबह उठने के बाद कुछ क्षण तक आपका मन बिलकुल शांत रहता है। क्यूंकि उस एक क्षण सिर्फ आप होते हो आपके साथ आपका मैं नहीं होता। और ज्युहीं आपका मैं आपसे जुड़ जाता है आपका मन फिर से बड़बड़ाने लगता है।
जब मैं के न होने में इतनी शांति होती है फिर ऐसे में इस मैं का क्या काम जो मन को हमेशा अशांत करता हो। जिस दिन आप इस तरह से सोचने लगेंगे उस दिन से आपका जीने का ढंग ही बदल जायेगा। उस दिन से आप हमेशा शांत रहने लगेंगे। आप वैसे भी वही करते हो जो आपको अच्छा फील कराता है। जिस दिन आपको सचमुच ये एहसास हो जायेगा की ये मैं शब्द से आपको नुकसान हो रहा है आप खुद ही इससे दूर हो जाओगे क्यूंकि इंसान का ये फितरत होता है की वो हर उस चीज को अपने से दूर करना चाहता है जो उसे दुखी करता है।
गोविंदा का एक एड आता था बनियान का। जिसमे वे बस में होते हैं और किसी व्यक्ति पे उनका धक्का लग जाता है तो वो व्यक्ति गोविंदा से कहते है की धक्का क्यों दिया ? फिर गोविंदा कहते है की तुझको लेने का मन नहीं था तो तूने लिया क्यूँ । ये बात भले ही एड में मजाक के रूप में दिखाया गया हो लेकिन ऐसा हम असल ज़िन्दगी में भी कर सकते है। हम बेवजह चिंता दुःख या क्रोध को अपने ऊपर लेते हैं और परेशान होते हैं। सच तो ये है की ये पूरी तरह से आपपर निर्भर करता है की आप मन के भावों को आपके ऊपर हावी होने देते है या फिर आप ही इन भावों पर हावी होते हैं।
क्यूंकि मन की शक्ति एक ऐसी शक्ति है की जबतक आप इनको वश में रखते हैं तबतक तो सबकुछ सही रहता है लेकिन एक बार ये आपके हाथ से निकल गया फिर आप चाहकर भी इन्हें रोक नहीं सकते क्यूंकि तब इनकी शक्ति आपके विवेक से ज्यादा शक्तिशाली हो जाता है। फिर इन्हें रोकना मुस्किल ही नहीं नामुमकिन हो जाता है। इसीलिए आपने देखा होगा की कई लोग हद पार कर जाते है चाहे प्यार में हो या क्रूरता में। क्यूंकि मन उनके विवेक पे हावी हो जाता है।
मन को बच्चे की तरह पालें उन्हें रोकना भी खतरनाक हो सकता है इसलिए उसे भूलके भी दबाने प्रयास न करें नहीं तो वो अपनी जिद पे अड़ जायेगा। इसलिए मन को अपनी ही स्तिथि में रहने दें। उनको छेड़े नहीं नहीं तो वो तूफ़ान बनकर आप ही को उडा ले जायेगा।

Achi jankari
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