मेरी आखरी कविता
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लो हार गया मैं। सपनों के उस पार गया मैं ।
जहाँ सपने नहीं है बसते, यहाँ तो हर दिन बदल जाते हैं रास्ते
जहाँ सपने नहीं है बसते, यहाँ तो हर दिन बदल जाते हैं रास्ते
कुछ उड़ती पतंग यहाँ, कुछ हैं कटी पतंग,
सबकी अपनी ख्वाहिशे सबकी अपनी जंग।
सबकी अपनी ख्वाहिशे सबकी अपनी जंग।
यहाँ सब भटके मंजिल के वास्ते,
हमारी तो मंजिल ही नहीं हम चले किस रास्ते।
हमारी तो मंजिल ही नहीं हम चले किस रास्ते।
सारे झूठे सपनों को मार गया मैं, लो हार गया मैं।
क्या पाया क्या खोया इसका क्या हिसाब करूँ
बहुत डर कर जिया और कितना डरूं
बहुत डर कर जिया और कितना डरूं
जीवन के रहस्य को स्वीकार गया मैं, लो हार गया मैं।
सोचा था मैं भी चलूँ जहाँ चले हैं सब
पर जीवन रूपी इस अमृत को यूँही ना खोएंगे अब
पर जीवन रूपी इस अमृत को यूँही ना खोएंगे अब
जीवन के इस दौड़ से बाहर गया मैं, लो हार गया मैं।
यहाँ सब है, कुछ नफरत भी है, कुछ प्यार है,
पर कुछ छूटा है अब भी, जिसकी दरकार है।
पर कुछ छूटा है अब भी, जिसकी दरकार है।
जहाँ सबकुछ है पर कुछ कुछ ना मिले, उस कतार गया मैं। लो हार गया मैं।
सपनों के उस पार गया मैं। जहाँ सपने नहीं है बसते, यहाँ तो हर दिन बदल जाते हैं रास्ते
सपनों के उस पार गया मैं। जहाँ सपने नहीं है बसते, यहाँ तो हर दिन बदल जाते हैं रास्ते
By Bipin Sen

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