कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है कि मैं भी वही करूं जो सब कर रहे है पर कुछ ही पल में मेरे खयाल बदल जाते हैं क्युकिं मुझे पता है कि मुझे जो चाहिए वो वहां है ही नहीं जहां सब भाग रहे हैं। ऐसा नहीं है कि मैं मेहनती नहीं हूं या आलसी हूं मेहनत नहीं करना चाहता। पर मै जानबूझकर मनुष्य के द्वारा बनाए हुए इस प्रपंज में फसना नहीं चाहता जो हमे फंसाने के लिए ही बनाया गया है।
अब मुश्किल ये है कि ये षड्यंत्र इतना बड़ा और फैला हुआ है कि न चाहते हुए भी आपको इसमें फंसना ही पड़ता है क्यूंकि जीने के लिए जो basic needs है वो आपको इस षड्यंत्र का हिस्सा बन के ही मिलेगी।
अभी तक शायद आपको clear नहीं हुआ होगा की में ये क्या बके जा रहा हूं। तो आइए स्पष्ट करते है।
क्या आपने कभी सोचा है कि आप कर क्या रहे हो ? मेरा मतलब आपके job या business से नहीं बल्कि आप अपने जीवन के साथ क्या कर रहे हो। ये article पढ़ने के बाद 10 minutes अकेले में बैठना और खुदको देखना, आपको पता लग जायेगा कि मैं क्या कहना चाहता हूं। आप बस 10 minutes किसी शांत सा जगह में जाना और गेहराई से खुदको analyse करना । ज्यादा कुछ नहीं बस सुबह से लेकर शाम तक का अपने ही दिनचर्या को देखना और feel करना की क्या आप वाकई में वो जिंदगी जी रहे हो जो आपको चाहिए। अगर नहीं, तो खुद से ये सवाल करना,तो फिर हम ऐसी जिंदगी क्यूं जी रहे है ?
आपमें से ज्यादातर लोगो का उत्तर यही होगा कि हम जो अपने 24 hours में करते हैं उनमें से 95 % काम ऐसे होते हैं जो हम वाकई में करना नहीं चाहते और फिर भी किए जा रहे हैं । यूं ज़हर ज़िन्दगी का पिए जा रहे हैं । क्यूंकि हम जीना भूल गए हैं हमें पता ही नहीं हम क्यों जी रहे हैं । बस जी रहे हैं ज़िन्दगी काट रहे हैं।
जीवन एक अमृत है। इसे ऐसे ही बेवकूफी में न गवांए।
जीवन के आनंदस्वरुप को जानें । इस बात को समझें की प्रकृति ने हमें सिर्फ office जाने के लिए नहीं दी है ज़िन्दगी और न ही social media पे timeline post करके अपने कीमती समय को बर्बाद करने के लिए।
अगर वाकई में जीवन का आनंद लेना है तो इसे categories करना सीखे। अपने आवाशक्ताओं को दो भागों में categories करें। "आपकी भौतिक आवश्कता" और "आपकी असली आवश्यकता जो की जीवन का मूल स्वरूप है"। इसे आप आध्यात्मिक आवश्यकता का नाम भी दे सकते हैं। पर नाम देना आवश्यक नहीं है। क्यूंकि जब हम नाम देते हैं तब हम असली चीज को छोड़कर नाम में ही उलझ कर रह जाते हैं।
हम अपने जीवन में भौतकतावाद में इतना ज्यादा उलझ गए हैं कि इसके अलावा हमें दूसरा कुछ दिखाई ही नहीं देता। और न ही हम देखने का प्रयास ही करते हैं।
हमारी मानसिकता इतना ज्यादा कमजोर हो गया है कि हम खुदको देखना नहीं दिखना पसंद करते हैं। जबसे ये दिखाने की कला विकसित हुई है हम जीने की कला भूल गए हैं। हम दिखावे को ही जिंदगी मान बैठे हैं ।
वैसे ऊपर ऊपर से देखने से हमें ऐसा लगता है कि आज जिंदगी बहुत आसान हो गई है। पहले जब आपके पास कोई साधन नहीं था तब हर चीज कितना मुश्किल था। खाने के लिए भी भटकना पड़ता था, आज कम से कम इतना तो है कि अगर आपके पास पैसे है तो आप खाना खरीद सकते है, इसके लिए आपको शिकार ढूंडने की जरूरत नही पड़ेगी। Technology ने सारा काम बहुत आसान कर दिया है ।
ऐसा हमें लगता है, पर ऐसा नहीं है। Technology ने सिर्फ हमारे भौतिक आवश्यकताओं को आसान बना दिया है लेकिन इसके लिए पूरे मानव सभ्यता को बहुत कीमत चुकाना पड़ा है। क्यूंकि इसने हमें खुद से ही अलग कर दिया है। या यूं कहे कि इनके नशे में हम खुदको ही भूल गए हैं ।
हम ये भूल गए हैं कि हमारा असली potential क्या है, हमारी असली ताकत क्या है। हम बस अपने ही गुलाम बनके रह गए हैं।
हम एक ऐसे अंधेरी गुफा में घुस गए हैं जिसमें जितना आगे बड़ते जाओ उसके अंदर से नए नए गुफाओं के दरवाजे खुलते जा रहे हैं लेकिन कहीं भी बाहर निकलने का रास्ता दिखाई नही पड़ रही।
और सबसे मज़े की बात तो ये है कि हमें पता ही नही की हम अंधेरे गुफ़ा में फंसे हुए है क्यूंकि यहां artificial lights लगे हुए है जो आपको दिन जैसा ही दिखाई पड़ता है पर दिन है नहीं। और जब हमें पता ही नहीं चलता है कि हम अंधेरी गुफा में कैद है तो फिर हम निकलने का प्रयास ही नहीं करते, और एक दिन इसी अंधेरे में ही खो जाते हैं रोशनी कहीं दूर छुट जाता है।
इसलिए जागो ग्राहक जागो ! तुमसे तुम्हारी जिन्दगी लूट रही है और तुम लुटाए जा रहे हो ।

No comments:
Post a Comment