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जीवन क्या है

जीवन क्या है ? ये जो हम जी रहे हैं या कुछ और।
जीवन का साधारण अर्थ तो ये है की जिव से जीवन बना है यानि की जितने भी जिव है सबके पास जीवन है।

सभी जिव अपना अपना जीवन जी रहे हैं पर क्या हम अपना जीवन जी रहे हैं ? अगर मुझसे पूछे तो, नहीं, हम जीवन नही जी रहे हैं बल्कि हमारा जीवन कट रही है। हम नींद में हैं और जीवन की धारा बही जा रही है।

सभी जिव अपनी अपनी जिंदगी बेहतर तरीके से जी रही है पर हम मनुष्य ही जीना भूल गए हैं।

अगर आप अपनी ही जीवन शैली पर गौर से नज़र डालें तो आप खुद समझ जायेंगे की मै क्या कह रहा हूँ।

अगर आप सिर्फ एक महीने तक अपनी ही जीवन शैली को देखें तो आपको पता चल जाएगा कि आप कुछ गिने चुने कामों को ही दोहराएं चले जाते हैं।

इस एक महीने के आंकलन से ही आप जिसे जीवन समझ रहे हैं उसकी वास्तविकता और क्षुद्रता का पता चल जाएगा।

वही क्रोध, वही चिंता, ईर्ष्या, वही खुशी वही नाराजगी। हमारे अंदर जितने भी विकार हैं उसको प्रकट करना और बार बार दोहराना क्या यही आपके जीवन का मूल्य है। क्या हमे इतनी खूबूरत जीवन सिर्फ इसीलिए मिला हुआ है।

अगर आप एक बार इस सवाल को गहराई को जान ले और खुदके अनुभव से ही मिले इनके अर्थ को समझ लें तो ही आप जीवन को सही मायने में समझ पाएंगे।

जीवन को समझने के लिए उनका मूल्यांकन करना जरूरी है वरना आप असली जीवन से वंचित राह जाएंगे।

जीवन बहुत ही सरल है, हम इंसानों ने ही उसे मुश्किल बना दिया है। हमें प्रकृति ने जीवन दिया है और हम प्रकृति से ही मुंह मोड़ लिए हैं।

जीवन की असली सत्य को जानना है तो सर्वप्रथम हमें प्रकृति से मित्रता करनी होगी। एक बार आप प्रकृति से जुड़ जाएं फिर आपकी जीवन से जुड़े हर सवाल का जवाब आपको खुद की मिल जाएगी।

आपको एहसास हो जाएगा की प्रकृति से मिले हुए इस अद्भुत जीवन का आप किस तरह क्षुद्र भौतिक सुख के व्यर्थ कर रहे हैं।

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